21 साल, 4000 चिट्ठियां और एक अधूरी लड़ाई: स्वतंत्रता सेनानी पिता का हक दिलाने की जिद में सरकार से लड़ रहा 75 वर्षीय बेटा

Updated on 18-06-2026 02:15 PM
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सिर्फ जमीन के टुकड़े का विवाद नहीं, बल्कि एक बेटे की अपने पिता के सम्मान के लिए लंबी लड़ाई की कहानी है।75 वर्षीय सुभाषचंद्र दुबे पिछले 21 वर्षों से सरकार को पत्र लिख रहे हैं। उनकी मांग न तो मुआवजे की है और न ही किसी आर्थिक लाभ की। उनका कहना है कि उन्हें सिर्फ अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिता रामलाल दुबे का सम्मान वापस चाहिए।
जानकारी के अनुसार टीटी नगर के 540 वर्गफीट के एलआईजी फ्लैट में रहने वाले सुभाषचंद्र दुबे भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त हैं। उनकी पत्नी मंजुला दुबे संस्कृत की व्याख्याता रही हैं। दोनों की कोई संतान नहीं है और पेंशन के सहारे संतोषपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसके बावजूद एक अधूरी लड़ाई उन्हें लगातार सक्रिय रखे हुए है।

1975 में मिली थी 10.41 एकड़ जमीन

दरअसल मामला ये है कि सुभाषचंद्र दुबे के पिता रामलाल दुबे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वर्ष 1975 में मध्य प्रदेश सरकार ने हरदा जिले के टिमरनी के पास स्थित जिनवानी गांव में उन्हें 10.41 एकड़ भूमि आवंटित की थी। इस आवंटन की ऋण पुस्तिका आज भी परिवार के पास सुरक्षित है।
लेकिन वर्ष 1978 में सरकार ने यह कहते हुए आवंटन निरस्त कर दिया कि संबंधित भूमि बड़े झाड़ के जंगल क्षेत्र में आती है। इसके बदले दूसरी जगह जमीन देने का आश्वासन दिया गया, लेकिन वह वादा कभी पूरा नहीं हुआ।

पिता ने लिखीं 1000 चिट्ठियां, बेटे ने 4 हजार

रामलाल दुबे ने अपने जीवनकाल में नेताओं और अधिकारियों को करीब एक हजार पत्र लिखे। वे लगातार न्याय की उम्मीद करते रहे, लेकिन उन्हें कोई ठोस जवाब नहीं मिला। न्याय के लिए संघर्ष करते हुए वर्ष 2005 में वह दुनिया से चले गए।
पिता की मृत्यु के बाद बेटे सुभाषचंद्र दुबे ने यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। पिछले 21 वर्षों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, राजस्व विभाग और जनप्रतिनिधियों को चार हजार से अधिक पत्र लिख चुके हैं, लेकिन आज तक मामले का अंतिम निराकरण नहीं हुआ।

"जमीन नहीं, पिता के सम्मान की लड़ाई है"

सुभाषचंद्र दुबे से लोग अक्सर पूछते हैं कि 75 वर्ष की उम्र में जमीन मिल भी गई तो उसका क्या करेंगे। इस पर उनका जवाब साफ है- "मुझे जमीन या संपत्ति का लालच नहीं है। मैं और मेरी पत्नी पेंशन पर सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं। जो पेंशन मिलती है, उसका बड़ा हिस्सा जरूरतमंदों की मदद में खर्च कर देते हैं।"
वे कहते हैं, "यह लड़ाई जमीन के लिए नहीं, मेरे पिता के स्वाभिमान के लिए है। अगर सरकार जमीन नहीं देना चाहती तो स्पष्ट रूप से कह दे, लेकिन यदि हमारा हक बनता है तो उसे स्वीकार किया जाए।"

भोपाल में प्लॉट देने का प्रस्ताव भी अटका

जानकारी के अनुसार कुछ समय पहले जिनवानी की जमीन के बदले भोपाल में एक प्लॉट देने की चर्चा हुई थी। सुभाषचंद्र इसके लिए भी तैयार थे, लेकिन वह प्रस्ताव भी फाइलों से आगे नहीं बढ़ पाया।
अब 75 वर्ष की उम्र में भी उनकी उम्मीद कायम है। वे कहते हैं, "जब तक सांस है, मैं अपने पिता के सम्मान की यह लड़ाई लड़ता रहूंगा।"


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