
भोपाल। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने स्पष्ट किया है कि नदियों में दूध अर्पित करना लोगों की आस्था का विषय है और इसके खिलाफ देश में कोई निषेधात्मक कानून नहीं है। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने चेतावनी भी दी है कि धार्मिक आयोजनों के नाम पर एक साथ हजारों लीटर दूध नदियों में प्रवाहित करने से जल पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है। इसलिए आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना समय की जरूरत है।
यह आदेश एनजीटी की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन पीठ (न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह और सुधीर कुमार चतुर्वेदी) ने सीहोर जिले के भेरूंदा क्षेत्र में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम के बाद जारी किया। गौरतलब है कि अप्रैल 2026 में सातदेव स्थित दादाजी दरबार पातालेश्वर महादेव मंदिर के 21 दिवसीय अनुष्ठान के समापन पर टैंकरों के जरिए लगभग 11 हजार लीटर दूध नर्मदा नदी में बहाया गया था, जिसे लेकर पर्यावरणीय चिंताएं जताई गई थीं।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि नर्मदा नदी का प्रवाह निरंतर बना रहने के कारण इस घटना से जल की गुणवत्ता पर कोई गंभीर या दीर्घकालिक दुष्प्रभाव दर्ज नहीं हुआ। नदी में पानी का बहाव तेज होने से 'नेचुरल सेल्फ-प्यूरिफिकेशन' की प्रक्रिया तेजी से हुई।
हालांकि, विशेषज्ञों ने आगाह किया कि दूध एक जैविक उत्पाद (Organic Material) है। इसे बड़ी मात्रा में डालने से पानी में 'बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड' (BOD) बढ़ जाती है। यदि पानी का बहाव कम हो या पानी ठहरा हुआ हो, तो इससे जलीय जीवों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
नर्मदा तटों पर होने वाले बड़े धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजनों के लिए प्रशासन पहले से स्थान निर्धारित करे। किसी भी बड़े आयोजन के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस से पहले मंजूरी लेना अनिवार्य हो। पूजन सामग्री, फूल-पत्तियां और अन्य अवशेषों को नदी में बहाने के बजाय तटों पर अलग से एकत्रित करने की व्यवस्था की जाए। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिए गए हैं कि वह ऐसे अवसरों पर जल की गुणवत्ता और पर्यावरणीय मानकों की कड़ी निगरानी रखे।