क्या गृहिणियों के श्रम को जीडीपी में शामिल किया जाना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद तेज हुई बहस

Updated on 15-06-2026 12:06 PM

भोपाल। सुबह की पहली चाय से लेकर रात के अंतिम काम तक, करोड़ों भारतीय गृहिणियां बिना वेतन, बिना छुट्टी और बिना किसी औपचारिक मान्यता के लगातार काम करती हैं। खाना बनाना, बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल, घर का बजट संभालना, परिवार के स्वास्थ्य का ध्यान रखना और भावनात्मक सहारा बनना—ये ऐसे कार्य हैं जिन पर पूरे परिवार की नींव टिकी होती है।

इसके बावजूद देश की आर्थिक व्यवस्था में इन कार्यों को लगभग अदृश्य माना जाता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने गृहिणियों को राष्ट्रनिर्माता बताते हुए उनके श्रम को आर्थिक मूल्य देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसके बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या गृहिणियों के अवैतनिक श्रम को देश की जीडीपी और आर्थिक गणनाओं में शामिल किया जाना चाहिए।

जीडीपी में क्यों नहीं दिखता गृहिणियों का योगदान?

  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश में होने वाली आर्थिक गतिविधियों का मूल्यांकन करता है, लेकिन इसमें केवल वही कार्य शामिल होते हैं जिनमें पैसों का लेन-देन होता है। यही कारण है कि यदि कोई महिला अपने परिवार के लिए भोजन तैयार करती है तो उसका आर्थिक मूल्य नहीं गिना जाता, लेकिन वही भोजन किसी होटल या रेस्टोरेंट में तैयार हो तो वह जीडीपी का हिस्सा बन जाता है।
  • इसी तरह यदि कोई बेटी अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करती है तो उसका योगदान आर्थिक आंकड़ों में दर्ज नहीं होता, जबकि किसी अस्पताल या केयर सेंटर द्वारा दी गई वही सेवा जीडीपी में शामिल हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही वह बड़ी खामी है जिसके कारण महिलाओं के घरेलू श्रम का वास्तविक मूल्य सामने नहीं आ पाता।

भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी अनदेखी सब्सिडी

  • विकास विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह के अनुसार भारत का विकास मॉडल करोड़ों महिलाओं द्वारा दिए जा रहे मुफ्त श्रम पर आधारित है। उनका कहना है कि देश की लाखों गृहिणियां ऐसी सेवाएं दे रही हैं जिनके लिए यदि पेशेवर कर्मचारी रखे जाएं तो भारी आर्थिक खर्च आएगा।
  • एसबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में गृहिणियों के अवैतनिक श्रम का आर्थिक मूल्य देश की जीडीपी का लगभग 15 से 17 प्रतिशत तक हो सकता है। यह योगदान कई बड़े आर्थिक क्षेत्रों के बराबर या उनसे अधिक माना जाता है। इसके बावजूद गृहिणियों को आधिकारिक रूप से "आर्थिक रूप से निष्क्रिय" श्रेणी में रखा जाता है।

समय का सबसे बड़ा निवेश महिलाएं कर रही हैं

  • भारत सरकार के टाइम-यूज सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय महिलाएं प्रतिदिन औसतन सात घंटे घरेलू कार्यों में लगाती हैं। इसके विपरीत पुरुष औसतन केवल एक घंटा घरेलू कार्यों के लिए देते हैं।
  • यह अंतर केवल श्रम का नहीं बल्कि अवसरों का भी है। घरेलू जिम्मेदारियों के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं नौकरी, व्यवसाय, उच्च शिक्षा और व्यक्तिगत विकास के अवसरों से दूर रह जाती हैं। यही कारण है कि भारत में महिला श्रम भागीदारी दर अभी भी अपेक्षाकृत कम है।

घरेलू श्रम के तीन बड़े स्तंभ

  • गृहिणियों का योगदान केवल खाना बनाने तक सीमित नहीं है।
  • भोजन और पोषण
  • परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक भोजन की व्यवस्था करना।
  • बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल
  • शिक्षा, स्वास्थ्य, भावनात्मक समर्थन और सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • घर का प्रबंधन
  • सफाई, बजट, खरीदारी, समय प्रबंधन और दैनिक आवश्यकताओं का संचालन करना।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन सभी सेवाओं के लिए अलग-अलग पेशेवर कर्मचारी नियुक्त किए जाएं तो प्रति परिवार कम से कम 15 हजार रुपये प्रतिमाह या उससे अधिक का खर्च आ सकता है।

दुनिया के कई देशों ने दी है मान्यता

  • घरेलू श्रम को औपचारिक मान्यता देने के प्रयास दुनिया के कई देशों में किए गए हैं।
  • स्वीडन में बच्चों और परिवार की देखभाल में बिताए गए वर्षों के आधार पर महिलाओं को पेंशन क्रेडिट दिया जाता है। इससे उनकी सामाजिक सुरक्षा मजबूत होती है।
  • कनाडा नियमित सर्वेक्षणों के माध्यम से घरेलू कार्यों में खर्च होने वाले समय का आकलन करता है और इन आंकड़ों का उपयोग सार्वजनिक नीतियां बनाने में करता है।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि भारत भी ऐसी व्यवस्थाओं से सीख लेकर महिलाओं के श्रम को अधिक सम्मान और सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?

  • उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान गृहिणियों को राष्ट्रनिर्माता बताया। न्यायालय ने कहा कि घरेलू कार्यों का समाज और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
  • यह टिप्पणी केवल भावनात्मक नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे भविष्य में गृहिणियों के लिए सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और आर्थिक मान्यता से जुड़े नए रास्ते खुल सकते हैं।

क्या गृहिणियों को वेतन मिलना चाहिए?

  • इस विषय पर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। कुछ लोगों का मानना है कि घरेलू श्रम को प्रत्यक्ष वेतन देना व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन इसके लिए पेंशन, बीमा, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक पहचान जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं।


अन्य महत्वपुर्ण खबरें

 16 September 2026
श्रीनगर : भारतीय रेलवे के जम्मू डिवीजन ने रेल के ज़रिए सीमेंट की अपनी पहली इंटरनल ढुलाई की है। इसके तहत शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी कठुआ रेलवे स्टेशन से…
 16 September 2026
पटना: बिहार की राजनीति और मिथिलांचल के लिए एक बड़ा गौरवपूर्ण अवसर सामने आया है। मधुबनी जिले की राजनगर विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के विधायक और भाजपा अनुसूचित…
 16 September 2026
पटना: समान नागरिक संहिता (UCC) के मुद्दे पर बिहार में सियासी पारा चढ़ गया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लगातार नीतीश कुमार और जेडीयू के पक्ष में बयान दे रहे…
 16 September 2026
गोंडा: कैसरगंज से पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह एक नए कानूनी पचड़े में फंस गए हैं। बाबा रामदेव के पतंजलि फूड्स लिमिटेड ने उनके खिलाफ 50 करोड़ रुपये की…
 16 September 2026
जयपुर: मरू प्रदेश के नाम से विख्यात राजस्थान के लिए बड़ी खुशखबरी है। दरअसल, राजस्थान ने पर्यावरण संरक्षण हरित क्षेत्र के विस्तार की दिशा में ऐतिहासिक कीर्तिमान कायम किया है।…
 16 September 2026
पटना: अब तक हर चुनाव में पटना शिक्षक क्षेत्र से एक नया कमाल करने वाले बीजेपी के उम्मीदवार प्रोफेसर नवल यादव की नैया इस बार डगमगा गई है। जनसुराज ने…
 10 September 2026
भोपाल, विश्व ईवी दिवस के अवसर पर बुधवार को राजधानी भोपाल में मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) की ओर से इलेक्ट्रिक वाहन जागरूकता रैली और ईवी एक्सपो का आयोजन किया…
 10 September 2026
भोपाल, मध्य प्रदेश में 7,500 पुलिस आरक्षकों की भर्ती के लिए कर्मचारी चयन मंडल ने शेड्यूल जारी किया है। आवेदन 22 सितंबर से 6 अक्टूबर तक किए जा सकेंगे।सफल उम्मीदवारों को…
 10 September 2026
भोपाल, मध्य प्रदेश सरकार ने पेट्रोल, डीजल और CNG पंप संचालकों को लंबित टैक्स असेसमेंट के मामलों में राहत दी है। वित्तीय वर्ष 2024-25 के पात्र मामलों में व्यापारियों की ओर…
Advt.