रायपुर, 28 अक्टूबर 2026/ छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका डबरियों (वर्षा जल संरक्षण हेतु बनाई गई छोटी संरचनाओं या तालाबों) और अमृत सरोवरों में मछली पालन से महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और समृद्ध हो रही हैं। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में अब खेतों और तालाबों के साथ आजीविका डबरियां, जलाशय और अमृत सरोवर भी किसानों तथा ग्रामीण परिवारों की आर्थिक समृद्धि का माध्यम बन रहे हैं। खेती और पशुपालन के साथ मत्स्य पालन को अपनाकर ग्रामीण परिवार अपनी आय के स्रोत बढ़ा रहे हैं। समूह की महिलाओं को और सशक्त बनाने के लिए अब इन्हें तालाब का पट्टा देकर उसमें मत्स्य पालन कराया जा रहा है। योजना में मत्स्य विभाग भी कार्य कर रहा है।

मछुआ समितियों के सदस्य सामूहिक रूप से मछली पालन कर रहे हैं, तो कहीं किसान आजीविका डबरियों में मछली उत्पादन के साथ सब्जी की खेती और सिंचाई का लाभ उठा रहे हैं। वहीं, स्व-सहायता समूहों की महिलाएं अमृत सरोवरों में मत्स्य पालन कर आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में निर्मित आजीविका डबरियां जल संरक्षण के साथ अतिरिक्त आय का माध्यम भी बन रही हैं। किसान इनमें वर्षा जल का संचय कर मछली पालन कर रहे हैं और जरूरत के अनुसार पानी का उपयोग सब्जी उत्पादन तथा फसलों की सिंचाई के लिए भी कर रहे हैं।

90 आजीविका डबरियाँ बनाई जा रही है

धमतरी जिले के भूखापारा, माडमशिल्ली, बिन्द्रापाली, डबरीनाला, चनागांव और छिन्दौरी जैसे अनेकों गांव में डबरियाँ बनाकर महिलाओं को मत्स्य पालन और मत्स्य उत्पादन गतिविधियों से बड़े पैमाने पर जोड़ा जा रहा है, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और गांवों में स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से धमतरी जिले में आजीविका डबरियों को आय संवर्धन का माध्यम बनाया जा रहा है। वीबी-जी रामजी योजनांतर्गत आजीविका डबरियों को जलनिधि के रूप में विकसित कर उनमें झींगा एवं मछली पालन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस पहल के तहत कॉर्पाेरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर ) के सहयोग से 55 डबरियाँ बनाकर महिलाओं को मत्स्य उत्पादन गतिविधियों से जोड़ा गया है। इससे ग्रामीण महिलाओं को अपने गांव में ही अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में पहल की गई है। इसी कड़ी में 90 आजीविका डबरियाँ और बनाई जा रही है ।

मछली पालन आत्मनिर्भर और समृद्धि का आधार

इस गतिविधि के अंतर्गत प्रत्येक आजीविका डबरी में 1,600 झींगा तथा 320 भारतीय प्रमुख कार्प ( इंडियन मेजर कार्प - आईएमसी) मछलियों के बीज डाले गए हैं। झींगा एवं मछली पालन को एक साथ बढ़ावा देने से उपलब्ध जल संसाधनों का उपयोग उत्पादन और आजीविका संवर्धन के लिए किया जा सकेगा। इस पहल के माध्यम से आगामी छह माह में प्रति डबरी औसतन 50 हजार रुपये लाभ प्राप्त होने का अनुमान है। यह अनुमानित लाभ है, जिसका वास्तविक परिणाम उत्पादन, जल की गुणवत्ता, पालन प्रबंधन, बाजार मूल्य और बिक्री पर निर्भर करेगा। मछलियों की वृद्धि 800 ग्राम से 1 किलोग्राम तक दर्ज की गई है।

महिलाओं को मिलेगा आय का अतिरिक्त साधन

आजीविका डबरियों के माध्यम से मत्स्य उत्पादन को बढ़ावा देने से महिलाओं को पारंपरिक आजीविका गतिविधियों के साथ आय का एक अतिरिक्त विकल्प मिल सकता है। स्थानीय स्तर पर उत्पादन होने से महिलाओं को अपने गांव में ही आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी का अवसर मिलेगा। इससे परिवार की आय में योगदान बढ़ाने, घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति में सहयोग करने तथा स्वरोजगार के प्रति महिलाओं का विश्वास मजबूत करने में मदद मिलेगी।

यह पहल केवल मत्स्य उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को उपयोगी आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है। योजनाबद्ध तरीके से डबरियों का उपयोग, मत्स्य बीज का उचित प्रबंधन, नियमित देखरेख और उत्पादन के बाद बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करना इस गतिविधि की सफलता के लिए अहम होगा। साथ ही, महिलाओं को मत्स्य पालन से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन, गुणवत्तापूर्ण बीज, आहार प…