बेहतर जिंदगी' का झांसा और सोशल मीडिया का मायाजाल
पुलिस की शुरुआती जांच और काउंसलिंग में यह बात सामने आई है कि बच्चियां किसी न किसी बहकावे में आकर कदम उठा रही हैं।।
उम्र का दायरा: लापता होने वाली बच्चियों की उम्र 6 से 17 वर्ष के बीच है। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा 12 से 17 साल की किशोरियों का है, लेकिन 6 से 10 साल की मासूम बच्चियों के गायब होने के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं।
मुख्य कारण: अधिकांश मामलों में ऑनलाइन फ्रेंडशिप, प्रेम प्रसंग, नौकरी या चकाचौंध भरी जिंदगी के झांसे जैसी वजहें सामने आई हैं।
गंभीर आशंकाएं: पुलिस और समाजशास्त्रियों को अंदेशा है कि कई मामलों के पीछे मानव तस्करी , जबरन श्रम और गंभीर शोषण जैसे काले रैकेट भी सक्रिय हो सकते हैं।
तलाश के लिए विशेष टीमें; लेकिन शुरुआती जांच में मुश्किलें
पुलिस प्रशासन का कहना है कि बच्चियों की तलाश के लिए साइबर सेल, सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल ट्रैकिंग की मदद से विशेष टीमें बनाई जाती हैं और ज्यादातर बच्चियों को सुरक्षित बरामद भी कर लिया जाता है।
हालांकि, पुलिस ने यह भी स्वीकार किया कि कई बार बच्चियां खुद ही घर छोड़कर चली जाती हैं, जिससे उनके बारे में सटीक जानकारी जुटाने और शुरुआती जांच को आगे बढ़ाने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ती है।
अभिभावकों के लिए 'साइबर अलर्ट'
- अपने बच्चों की सोशल मीडिया एक्टिविटी और उनके फ्रेंड सर्कल पर नजर रखें।
- बच्चों से संवाद बनाए रखें ताकि वे किसी बाहरी व्यक्ति के झांसे या 'फेक आईडी' के बहकावे में न आएं।
- अनजान लोगों द्वारा दिए जा रहे बड़े ऑफर्स (नौकरी/मॉडलिंग) की सत्यता जांचें।